Surdas (सूरदास)

0
579

अष्टछाप के सर्वश्रेष्ठ कवि सूरदास का जन्म वैशाख सुदी पञ्चमी, सन् 1478 ई. में आगरा से मथुरा जानेवाली सड़क के पास रुनकता नामक गाँव में हुआ था कुछ विद्वान् इनका जन्म दिल्ली के निकट सीही गाँव में मानते हैं सूरदास जन्मान्ध थे या नहीं, इस सम्बन्ध में अनेक मत हैं ये बचपन से ही विरक्त हो गए थे और गऊ घाट में रह कर विनय के पद गाया करते थे एक बार वल्लभाचार्य गऊ घाट पर रुके। सूरदास ने उन्हें स्वचरित एक पद गा कर सुनाया तो वल्लभाचार्य ने इनको कृष्ण की लीला का गान करने का सुझाव दिया।

ये वल्लभाचार्य के शिष्य बन गये और कृष्ण लीला का गान करने लगे वल्लभाचार्य ने इनको गोवर्धन पर बने श्री नाथ जी के मंदिर में कीर्तन करने के लिए रख दिया।वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने अष्टछाप के नाम से सूरदास सहित आठ कृष्ण -भक्त कवियों का संगठन किया। इनकी मृत्यु गोवर्धन के पास पारसौली ग्राम में सन् 1583 ई. के लगभग हुई।

सूरदास के पदों का संकलन सूरसागर है। सूर सारावली तथा साहित्य लहरी इनकी अन्य रचनाएँ हैं। यह प्रसिध्द है कि ‘सूरसागर’ में सवा लाख पद हैं, पर अभी तक केवल दस हजार पर ही प्राप्त हुए हैं। ‘सूर सारावली’ कथावस्तु, भाव, भाषा, शैली और रचना की दृष्टी से निःसन्देह सूरदास की प्रामाणिक रचना है इसमें 1, 107 छन्द हैं। साहित्य लहरी सूरदास के 118 पदों का संग्रह है सूरदास की रचनाओं के सम्बन्ध में इस प्रकार कहा जा सकता है

                           “साहित्य लहरी, सूरसागर, की सूर सारावली।

                       श्री कृष्ण जी की बाल -छवि पर लेखनी अनुपम चली।’

सूरदास ने कृष्ण की बाल लीलाओं का बड़ा ही विशद् तथा मनोरम वर्णन किय है। बाल -जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं, जिस पर इस कवि की दृष्टि न पड़ी हो। इस लिए इनका बाल -वर्णन विश्व -साहित्य की अमर निधि बन गया है। गोपियों के प्रेम और विरह का वर्णन भी बहुत आकर्षक है। संयोग और वियोग दोनों का मर्मस्पर्शी चित्रण सूरदास ने किया है। सूरसागर का एक प्रसंग भ्रमरगीत कहलाता है इस प्रसंग में गोपियों के प्रेमावेश ने ज्ञानी उध्दव को भी प्रेमी एवं भक्त बना दिया। सूर के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है इनकी तन्मयता ये जिस प्रसंग का वर्णन करते हैं उनमें आत्मविभोर कर देते हैं इनके विरह वर्णन में गोपियों के साथ ब्रज की प्रकृति भी विषदमग्न दिखायी देती है सूर की भक्ति मुख्यतः सखा भाव की है उसमें विनय, दाम्पत्य और माधुर्य भाव का भी मिश्रण है। सूरदास ने ब्रज के लीला -पुरुषोत्म कृष्ण की लीलाओं का ही विशद् वर्णन किया है। सूरदास का सम्पूर्ण काव्य संगीत की राग -रागिनियों में बँधा हुआ पद -शैली का गीतिकाव्य है। उसमें भाव -साम्य पर आधारित उपमाओं, उत्प्रेक्षाओं और रूपकों की छटा देखने को मिलती है। इनकी कविता ब्रज भाषा में है। माधुर्य की प्रधानता के कारण इनकी भाषा बड़ी प्रभावोत्पादक हो गयी है व्यंग, वक्रता और वाग्विग्धता सूर की भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं सूर ने मुक्तक काव्य-शैली को अपनाया है कथा -वर्णन में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है समग्रतः इनकी शैली सरस एवं प्रभावशाली है।

भाषा शैली – सूरदास जी ने ब्रज भाषा का प्रयोग बड़ा ही सुन्दर किया है सूर के हाथों से जिस सौष्ठव के साथ ली है। वैसा सौंदर्य उसे बिराले कवि ही दे सके। साहित्य में स्थान – महाप्रभू बल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ ने चार शिष्य अपने पिता को मिलाकर और चार और कृष्ण भक्त को मिलाकर आठ बड़े भक्ति -कवियों का ‘अष्टछाप कवि बनाया था।

सूरदास की रचनाओं में लिखित पाँच ग्रन्थ बताये जाते है जो निम्न लिखित है-
सूरसागर
साहित्य -लहरी
ब्याहलो
नल-दमयन्ती

Surdas short Biography

Bio/Wiki

  • Name: Surdas
  • Date Of Birth: 1478
  • Birthplace: (Information not available)
  • Nationality: Indian
  • Profession: Author

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here