Ian Cardozo biography in hindi (इयान कार्डोज़ो)

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कायरों की तरह जीने से तो मरना अच्छा है यह मोटो है हमारे भारत के गोरखा रेजीमेंट का जिस के सिपाहियों को सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा खतरनाक वह बहादुर माना जाता है और आज की इस वीडियो में हम आपको ऐसे ही एक बहादुर गोरखा सिपाही मेजर जनरल कार्डोजो की शौर्य गाथा सुनाने जा रहे हैं जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे दरअसल कार्डोजो वह बहादुर सिपाही हैं जिन्होंने पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान अपने पैर के जख्मी हो जाने पर खुद ही अपने हाथों से उसे काटकर अलग कर दिया था ताकि यह#IanCardozo देश के पहले और एकमात्र ऐसी सिपाही भी हैं जिन्होंने विकलांग होने के बावजूद भी मेजर जनरल के पद को हासिल किया और दोस्तों की कहानी बॉलीवुड फिल्म आने वाली है अक्षय कुमार जानकार दोस्तों की इसी कहानी पर ही जल्द एक बॉलीवुड फिल्म गोरखा भी आने वाली है उसमें की बॉलीवुड स्टार अक्षय कुमार की आन कार्डोजो का रोल निभाते हुए दिखाई देंगे दोस्तों के आंकडों का जन्म ब्रिटिश इंडिया के मुंबई प्रेसिडेंसी में आने वाली मुंबई शहर में हुआ था जिससे कि आज हम सभी लोग मुंबई के नाम से जानते हैं उन्होंने अपने स्कूल व कॉलेज की पढ़ाई मुंबई के इस सेंट जेवियर हाई स्कूल और सेंट जेवियर कॉलेज से पूरी की और फिर उसके बाद नेशनल डिफेंस अकैडमी एनडीए स्नातक की उपाधि प्राप्त करके इंडियन मिलिट्री एकेडमी को जांच में शामिल कर लिया गया था और उन्होंने गोरखा राइफल्स की अलग-अलग बटालियन में काम किया था या शुरुआत से ही एक जांबाज सिपाही थे जिनके अंदर देशभक्ति का जज्बा कूट कर भरा हुआ था अपने करियर में उन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध में भाग लिया था लेकिन उन्होंने युद्ध में आया था मुख्य रूप से उसी के लिए आज सबसे ज्यादा याद किया जाता है और उनके बहादुरी भरे कारनामे आज भी लोगों को सुनाए जाते हैं के दौरान पाकिस्तान के सिपाहियों के अत्याचारों के चलते वहां रहने वाले लोग भारत के तरफ पलायन करने पर मजबूर हो गए थे और इसी वजह से भारत पाकिस्तान के बीच में युद्ध लड़ा गया था जिसमें हमारी भारतीय सेना ने पाकिस्तान को शिकस्त देकर पाकिस्तान से आजाद करवाया था और इस युद्ध के नतीजे ही दुनिया में एक बिल्कुल नए देश का जन्म हुआ था जिसे पेटी आज हम सभी लोग बांग्लादेश के नाम से जानते हैं यान कार्डोजो जिन्हें उनके मुश्किल नाम की वजह से उनके साथी कारतूस साहब का कर बुलाते थे इस युद्ध के दौरान विस्फोट गोरखा राइफल की स्विफ्ट बटालियन में थे और जिस समय उनकी बटालियन सिलहट में पाकिस्तानी सिपाहियों से जंग लड़ रही थी तब ज्ञान कार्डोजो डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज वेलिंगटन में ट्रेनिंग कर रहे थे लेकिन इस बटालियन के सेकंड हैंड कमांडो पाकिस्तानी सेना से लड़ते हुए शहीद हो गए आंकडों को तुरंत उनके जगह लेने का आदेश या गया और यह आर्डर मिलते ही वे भारतीय सेना के पहले रैली बोर्ड में ऑपरेशन को अंजाम देते हुए समय पर अपने बटालियन में पहुंच गए और फिर इसके बाद से भारत व पाकिस्तान के सिपाहियों के बीच हुआ युद्ध हुआ था जिससे कि पैटर्न लॉक से लटका नाम दिया गया इस युद्ध में दोनों ही तरफ से भारी गोलाबारी चल रही थी और एक तरफ पाकिस्तान की एक अच्छी खासी बड़े सेना थी उनके पास हथियार भी भारतीय सैनिकों से कहीं ज्यादा थी और दूसरी तरफ भारत की एक छोटी सी गोरखा बटालियन जिसमें कुल मिलाकर सिर्फ 384 सैनिक की दरअसल हुआ यह के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल यह सूचना मिली थी कि पाकिस्तान ने अपनी ब्रिगेड को हटाकर दूसरी जगह पर भेज दिया है और वहां पाकिस्तान के सिर्फ 200 से 300 सिपाही मौजूद हैं इसलिए सोचा कि पाकिस्तान के सिपाहियों के लिए गोरखा की एक छोटी सी बटालियन है काफी रहेगी और यह सोचकर उन्होंने उस बटालियन में भेज दिया था लेकिन उनको वहां जाने के बाद पता चला कि गलत इंफॉर्मेशन मिली थी पाकिस्तान की दो बड़ी थी जिसमें कि 8000 से भी ज्यादा सिपाही मौजूद थी यह कई दिनों तक लगातार इसी तरह चलता रहा सिपाही अपनी पूरी ताकत झोंक रहे लेकिन जैसे जैसे दिन बीत रहे थे वैसे वैसे भारतीय सिपाहियों की चिंता बढ़ती जा रही थी क्योंकि उनके पास मौजूद खाना व गोला-बारूद बेहद तेजी से खत्म हो रहा था हालांकि भारतीय सिपाहियों से कहा गया कि 48 घंटों में उनके पास मदद पहुंचा दी जाएगी लेकिन वे चारों तरफ से पाकिस्तानी सिपाहियों से गिर चुकी थी जिसके चलते जमीन के रास्ते उन तक कोई भी मदद नहीं पहुंचाई जा सकती बटालियन में शहीदों के गिनती लगातार बढ़ती जा रही थी काफी उन सिपाहियों के पास सिर्फ खाना ही नहीं बल्कि पीने के लिए भी साफ पानी नहीं बचा था जिसके चलते वे तालाब के गंदे पानी को पी कर अपना गुजारा कर रहे थे युद्ध कुछ दिनों तक और आगे बढ़ता तो इसमें भारतीय सिपाहियों की हार होगी लगभग तय थी लेकिन तभी अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने कि पूरे सिचुएशन को ही बदल कर रख दिया दरअसल हुआ यह कि बीबीसी की तरफ से रेडियो पर गलती से या खबर चला दी गई कि सिलहट में भारत में अपनी पूरी ब्रिगेड को उतार दिया है और इस खबर को भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों के सिपाही सुन रहे थे और यह खबर सुनते ही जानकार लोगों के दिमाग में एक आईडी आया और उन्होंने अपने साथियों से कहा कि अगर पाकिस्तानियों को लगता है कि लास्ट में हमारी पूरी ब्रिगेड मौजूद है तो हम लोग जानबूझकर ऐसा ही उन्हें आभास करवाएंगे कि वे सच में किसी बटालियन से नहीं बल्कि एक ब्रिगेड के साथ जंग लड़ रहे हैं इसके बाद से उन्होंने अपने सिपाहियों को चारों तरफ तैनात कर दिया जिससे पाकिस्तान के सैनिकों को लगे कि भारतीय सिपाही तादात में उसे काफी ज्यादा है और फिर आओ करने के बाद से उन्होंने पाकिस्तान के सिपाहियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग करनी शुरू कर दी और दोस्त जबरदस्त हमले को देखकर पाकिस्तान के सिपाहियों को यकीन हो गया वाकई में मौजूद है और इससे उनका मनोबल इतनी बुरी तरह सैनिकों के सामने अपनी हार को स्वीकार कर दिया पाकिस्तान के उन हजारों ने हथियार डाल दिए तब जाकर बटालियन के सामने ही हार मान ली थी की खात्मा हो जाने के बाद 16 दिसंबर 1971 के दिन जंगल कार्डोजो कमांडर की हेल्प करने के लिए दूसरी जगह पर भेजा गया लेकिन दोस्तों वहां जाते हुए रास्ते में ही जानकार दोस्तों का पैर पाकिस्तान द्वारा बिछाई गई है कि लैंडमाइन पर पड़ गया और वे एक जबरदस्त विस्फोट के शिकार बन गए इस धमाके में उनका बायां पैर पूरी तरह से जख्मी हो गया था और जख्मी हालत में उन्हें तुरंत मेडिकल कैंप लेकर जाया गया जहां एक जूनियर डॉक्टर ने उनके जख्म की जांच की लेकिन युद्ध के दौरान सारी दवाइयों और मेडिकल इक्विपमेंट्स खत्म हो चुके थे इस कारण से डॉक्टर जाकर भी उनका कोई भी ट्रीटमेंट नहीं कर पा रहे थे हो जिसके बाद यान कार्डोजो मदद पहुंचने का इंतजार करने लगे लेकिन कई घंटो तक इंतजार करने के बाद भी उनके पास किसी भी प्रकार की मदद नहीं पहुंची तो उन्होंने उस डॉक्टर से कहा कि वह उनका पैर काट दी क्योंकि जनरल कार्डोजो को डर था कि कहीं उनका जख्म सड़ना जाए लेकिन उस डॉक्टर ने तो उनका पैर काटने से साफ इनकार कर दिया क्योंकि उस समय उनके कैंप में यह आसपास किसी भी प्रकार का मेडिकल किट या पेन किलर उपलब्ध नहीं था उसके बाद कार्डोजो ने अपने एक दोस्त से कहा कि वह उनका पैर काट दे लेकिन उनके दोस्त ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया उसके बाद उन्होंने अपने दोस्त से एक छोटी धारदार तलवार मांगी और अपने हाथ से अपने पैर को काट दिया और पैर की करते उनके शरीर से खून बहुत ही तेजी से बहने लगा जिसके चलते उनका जल्द से जल्द ऑपरेशन करना जरूरी हो गया और उसी समय जनरल कार्डोजो के कमांडिंग ऑफिसर उनके पास आए बताएं कि पाकिस्तान का एक मेडिकल हॉस्पिटल है जहां का ऑपरेशन करने के लिए तैयार हो चुका है लेकिन पाकिस्तानी डॉक्टर से अपना इलाज कराने से साफ-साफ इंकार कर दिया उन्होंने कहा कि मैं किसी भी पाकिस्तान से अपना इलाज नहीं कर पाऊंगा हालांकि इसके बाद से जब कमांडिंग ऑफिसर ने ज्यादा जोड़ दिया तो फिर भी दो शर्तों पर अपना ऑपरेशन करवाने के लिए राजी हो गए जिसमें की पहली शर्त उन्होंने यह रखी कि वह किसी भी पाकिस्तानी का खून नहीं लेंगे और उनकी दूसरी शर्त यह थी कि ऑपरेशन के दौरान कमांडिंग ऑफिसर उनके पास ही रहेंगे क्योंकि उन्हें डर था कि पाकिस्तानी डॉक्टर उनका दूसरा पैर भी ना काट दी और दोस्तों कमांडिंग ऑफिसर नहीं उनकी इन दोनों शर्तों को मान लिया जिसके बाद उस हॉस्पिटल में उनका ऑपरेशन किया गया और फिर जख्म थोड़े सही होने के बाद से पुणे के आर्मी हॉस्पिटल में उनके टांग पर एक नकली पर लगाया गया अब जाने के बाद से आर्मी के सीनियर ऑफिसर ने कहा कि विकलांग होने के नाते भी बटालियन नहीं कर सकती और आपका से काम करवाया जाएगा लेकिन ना बहादुर सिपाही अपने जीवन में हार कैसे मान सकता था उन्होंने कहा कि मैं इस कंडीशन में भी दूसरे सिपाहियों को आसानी से हरा सकता हूं और उनकी यह बात साबित करवाने के लिए उनसे बैटल फिजिकल टेस्ट भी लिया गया जिसमें उन्होंने साथ ऐसे सिपाहियों को बीट करके दिखाया जिनके दोनों पैर सही सलामत है उन्होंने उन सिपाहियों से दौड़ लगाकर उन्हें हराया भी बल्कि बर्फ की 48 फीट ऊंचाई भी चढ़कर दिखाई और उनके इस जज्बे को देखते हुए उन्हें उनकी बटालियन वापस सौंप दी गई उसके बाद 1984 के दौरान उन्हें ब्रिगेडियर पद में प्रमोट किया गया इस तरह 1971 से 1993 तक वह एक नकली पैर के सहारे भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देते रहे हालांकि 1993 में उन्होंने अपनी सर्विस रिटायरमेंट ले लिया और उसके बाद से वे दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहते हैं तो कैसा लगा आपको यह बायोग्राफी पढ़कर कमेंट बॉक्स में मुझे जरूर बताइएगा और ऐसे ही बकरा पढ़ने के लिए बायो हिंदी में डॉट कॉम को फॉलो करते रहिए

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