Gautam Buddha (गौतम बुद्ध)

0
26

आज हम बात करने वाले हैं महान समाज सुधारक दार्शनिक और धर्म गुरु भगवान बुद्ध जी के जीवन के बारे में इन्होंने अपने विचारों से दुनिया को नया रास्ता दिया |

गौतम बुद्ध जी का जन्म 563 ईसा पूर्व के समय कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी नेपाल में हुआ था| इनका जन्म गौतम गोत्र में होने के कारण इनका नाम गौतम रख दिया गया इनके पिता जी का नाम सुदोहन था जो कि एक राजा थे इनकी माता जी का नाम देवी कोली था| उनके जन्म के 7 दिन के अंदर ही इनकी माता जी की मृत्यु हो गई जिसके बाद उनका लालन-पालन इनकी मौसी और राजा की दूसरी पत्नी रानी गौतमी ने किया और गौतम बुध का नाम सिद्धार्थ रख दिया गया हम यह भी कह सकते हैं कि इन्हें सिद्धार्थ के नाम से बुलाया जाता था इनके नाम रखने का मतलब यह था कि इन का जन्म बहुत ही सिद्धियों के बाद हुआ था यह बचपन में बहुत ही दयालु और करुणा स्वभाव के व्यक्ति पर यह बचपन में अन्य बच्चों के साथ खेलते खेलते स्वयं ही हार जाया करते थे जिससे कि सामने वाले बच्चों को दुख ना हो इनके चाचा के पुत्र देवदत्त जिन्होंने धनुष बाण की विद्या प्राप्त की थी और धनुष चला कर एक पक्षी को घायल कर दिया था और बाद में सिद्धार्थ ने उस काल पक्षी की जान बचाई थी यह कहानी आपने तो बड़ी ही होगी सिद्धार्थ अपनी बचपन की शिक्षा विश्व गुरु विश्वामित्र से पूरी हैं उन्होंने वहां वेद उपनिषद के साथ साथ युद्ध विद्या की शिक्षा प्राप्त की सिद्धार्थ ने बचपन में घुड़सवारी धनुष बाण रथ हगना जैसे चीजों में अब्बल स्थान प्राप्त किया था सिद्धार्थ की शादी मात्र 16 वर्ष में हो गई और इनका विवाह राजकुमारी यशोधरा के साथ हुआ इनकी शादी के बाद एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया लेकिन इनका परिवार गृहस्ती जीवन में बिल्कुल भी नहीं लगता था और उन्होंने मोह माया को त्याग कर जंगल जाने का फैसला किया और कुछ समय पश्चात वे जंगल चले गए|
इन्होंने जंगल में जाकर कठोर तपस्या शुरू कर दी और तिल चावल खा करें अपना जीवन यापन किया करते थे कठोर तपस्या के बाद उनका शरीर का सख्त हो गया और तपस्या करते करते 6 साल हो गए 1 दिन सुबह में तपस्या कर रहे थे तभी अचानक से कुछ महिलाएं नगर से लौट रही थी और सिद्धार्थ को तपस्या करते हुए देखा वह गीत गा रही थी और उन का गीत सिद्धार्थ के कानों पर पड़ा जिसके कारण तपस्या भंग हो गई|

वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ वटवृक्ष के नीचे ध्यानपूर्वक अपने ध्यान में बैठे थे. गाँव की एक महिला नाम सुजाता का एक पुत्र हुआ था, उस महिला ने अपने पुत्र के लिये उस वटवृक्ष से एक मन्नत मांगी थीं जो मन्नत उसने मांगी थी वो उसे मिल गयी थी और इसी ख़ुशी को पूरा करने के लिये वह महिला एक सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर उस वटवृक्ष के पास पहुंची थीं |उस महिला ने बड़े आराम से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई उसी तरह आपकी भी हो. उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की एक साधना सफल हो गयी थीं, उसे सच्चा बोध हुआ तभी से सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए. जिसे पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला था वह वृक्ष बोधिवृक्ष कहलाया और गया का सीमावर्ती जगह बोधगया कहलाया|

वें 80 वर्ष तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पली में प्रचार करते रहें तथा की धर्म लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी. 4 सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरुप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े. पहले उन्होंने 5 मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिये भेज दिया|

पाली सिद्दांत के सूत्र के अनुसार 80 वर्ष की आयु में बुद्ध ने यह घोषणा की| गौतम बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन जिसे उन्होंने कुंडा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था उसे ग्रहण किया, जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये| गौतम बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को एक निर्दश दिया था कि वह कुंडा को समझाए कि उसने कोई गलती नहीं की हैं, उन्होंने कहा कि यह भोजन महान और अतुलनीय हैं|

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here